पतंजलि आजकल कर रहा ऐसा क्लीनिकल ट्रायल, सुनकर उड़ जाएंगे आपके होश…

दुनिया में आज तक कहीं भी आयुर्वेदिक दवाओं के क्लीनिकल ट्रायल मरीजों पर नहीं हुए हैं। आयुर्वेद ग्रंथों में मौजूद संकेतों के हिसाब से रोगियों को दवा दी जाती है। केवल एलोपैथी के क्षेत्र में क्लीनिकल ट्रायल होते आए हैं। पंतजलि विश्व का ऐसा पहला संस्थान बन गया है, जहां ट्रायल चूहों, खरगोश, कुत्तों आदि पर आयुर्वेदिक दवाओं के प्रयोग हो रहे हैं। सारा प्रयोग सफल हो जाने के बाद इनका उपयोग पतंजलि के दो अस्पतालों में किया जाता रहा है।

पंतजलि योगपीठ की विश्वस्तरीय चार प्रयोगशालाओं में देशभर से जुटे 500 वैज्ञानिक इस काम में जुटे हुए हैं। क्लीनिकल ट्रायल विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से भेजी गई गाइड लाइन के हिसाब से किया जा रहा है।
योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि विश्व में पतंजलि ऐसी संस्था बन गई है, जिसे इन ट्रायल के लिए भारत सरकार से एनएबीएल प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ है। यह प्रमाणपत्र अब तक केवल एलोपैथिक अनुसंधानशालाओं को दिया जाता था। शास्त्रों में वर्णित दवाएं रोगी पर कैसे काम करती हैं, इसका पूरा ब्योरा रखा जा रहा है। साथ ही दो, तीन और चार जड़ी बूटियों को मिलाकर नए योग, मिश्रित औषधि और भस्म तैयार की जा रही है। चिकित्सा की भाषा में इस कार्य को रिवर्स फार्मा कहा जाता है।
आचार्य ने बताया कि इन दवाओं के प्रयोग गंभीर रोगों से ग्रसित पशुओं पर किए गए और लगभग शत प्रतिशत सफलता प्राप्त की गई। पतंजलि अनुसंधानशाला बायोसेल्फ लेबल थ्री स्तर की है।
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आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि इन आयुर्वेदिक कम्पाउंड्स के प्रयोग दुनिया भर से एकत्रित मुनष्यों की कोशिकाओं पर भी किए जा रहे हैं। ये कोशिकाएं दुनिया के विभिन्न महाद्वीपों से प्राप्त की गई हैं। इन में यूरोपियन, अमेरिकन, अफ्रीकन और अरेबियन कोशिकाएं शामिल हैं। सभी कोशिकाएं प्रयोगों के बाद रोग मुक्त पाई गई हैं।
आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि पतंजलि की अनुसंधानशालाओं में दुनिया के 72 हजार पौधों पर अनुसंधान का कार्य चल रहा है। साथ ही विश्वभर में उपलब्ध वन जड़ी बूटियों पर वर्ल्ड हर्बल एनसाइक्लोपीडिया तैयार करने का काम तीन वर्षों से लगातार किया जा रहा है। दुनिया में जहां भी जो औषधीय पौधा उपलब्ध है, उसे पतंजलि के अनुसंधानशाला में लाकर शोध कार्य जारी है।
प्राचीन ग्रंथों में वर्णित औषधियों को शोधित, परिष्कृत एवं परिवर्धित करने का काम जीवन रक्षक दवाएं तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि शीघ्र ही आयुर्वेदिक औषधियां उन रोगों के इलाज में कारगर साबित होंगी, जिन रोगों को एलोपैथी असाध्य बताकर छोड़ देती है। उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पतंजलि द्वारा भेजी गई क्लीनिकल ट्रायल की सभी रिपोर्ट स्वीकार करते हुए उन्हें असाध्य रोगों के निदान में उपयोगी बताया है।
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स्वामी रामदेव की पतंजलि योगपीठ ने वर्ष 2003 से लेकर वर्ष 2005 तक रोगियों पर योग और प्राणायाम के क्लीनिकल ट्रायल कराए थे। उन्हें भी डब्ल्यूएचओ सहित दुनिया के कई देशों ने मान्यता दी। प्राणायाम से अनेक रोग पूर्णत: समाप्त हुए। जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने चार वर्ष पूर्ण योग को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का दर्जा दिया, तब प्राणायाम के वे क्लीनिकल ट्रायल यूएनओ के विशेषज्ञों को दिखाए गए। उसी के बाद योग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त हुई।
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