प्रेरक-प्रसंग: सांसारिक जीवन से दूर

बात बहुत पुरानी है। एक बार एक साधक साधना में लीन था। तभी उसी रास्ते से एक स्त्री अपने प्रिय से मिलने जा रही थी। वह प्रिय में इतनी खोई हुई थी, कि उसका पैर गलती से साधक को लग गया।

तब साधक ने स्त्री से गुस्से में कहा, ‘क्या आप अंधी हैं?’
स्त्री ने कहा, ‘हे सन्यासी! क्या तुम अपने आराध्य की साधना में मग्न थे?’
मुझे देखो मैंने अपने प्रिय के प्रेम में अपनी सुध-बुध भी खोई हुई है।
इतना सुनकर सन्यासी चुप हो गया। उसे वो ज्ञान मिला था जो वह खुद कभी नहीं समझ पाता।
शिक्षा : गृहस्थ जीवन ही सबसे बड़ा तप है।
 
 
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