World Theatre Day: नाटक समुदाय से जुड़कर ये कलाकार महसूस करते हैं सम्मानित, याद किए अपने पुराने रंगमंच के दिन

रंगमंच की दुनिया बहुत ही रंगीली होती है. यहां अलग-अलग तरह के किरदार होते हैं. कई बार ये असल जिंदगी को अपने तरीके से जीवंत कर देती है और इसलिए असल दुनिया को एक बड़ा रंगमंच कहा गया है. शेक्सपियर की ये बात आज तक लोगों के दिमाग में बसी है. नाटक की दुनिया का जश्न मनाने के लिए आज यानि 27 मार्च का दिन बना है जहां हम बात करेंगे उन नाटक की दुनिया के कलाकारों से जहां से दिग्गजों ने बड़े पर्दे पर कदम रखा. अपनी पुरानी यादों को ताजा कर रहे कलाकारों के अनुभवों को जानते हैं….

हिमानी शिवपुरी  

संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार हासिल कर चुकी अभिनेत्री हिमानी शिवपुरी जी थिएटर के टेलीप्ले हमीदबाई की कोठी से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने अपने रंगमंच की यादों को साझा करते हुए कहा, ‘थिएटर हमेशा मेरा पहला प्यार था। स्कूल और कॉलेज में थिएटर करने के बाद, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने एक कलाकार के तौर पर खुद को विकसित करने में काफी मदद की। मैंने नाटक मित्रो मरजानी में मित्रो की भूमिका निभाई, जो बी.एम. शाह द्वारा निर्देशित था और यह वास्तव में आश्चर्यजनक था। दरअसल इसमें मैंने पहली भारतीय रंगमंच में, एक ऐसी महिला का किरदार निभाया जो अपनी शारीरिक जरूरतों के बारे में बोल्ड है और अपने शरीर पर गर्व करती है।’
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शिखा तलसानिया  

जी थिएटर के टेलीप्ले इंटरनल अफेयर्स की अभिनेत्री शिखा तलसानिया कहती हैं, ‘मेरा बचपन बहुत हद तक बैकस्टेज ही बीता है क्योंकि मेरे माता-पिता थिएटर आर्टिस्ट हैं। हर बार जब वे स्टेज पर जाते थे उन्हें जादुई रूप से नए रूप में देखना दिलचस्प होता था। मुझे यकीन नहीं था कि मैं थिएटर में अपना करियर बनाऊंगी, लेकिन मुझे पता था कि मैं किसी ना किसी तरह से थिएटर का हिस्सा बनूंगी।’ अपने दिल के सबसे करीब के नाटक के बारे में उन्होंने कहा, ‘सखा सय्यरा जिसका प्रोडक्शन मेरे माता पिता ने किया था इसके साथ ही द अग्ली वन, और देख बहन आज भी मेरे सबसे करीब है।’ अभिनेत्री ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं थिएटर समुदाय का हिस्सा बनकर काफी सम्मानित महसूस कर रही हूं। प्रत्येक व्यक्ति जो किसी भी नाटक का हिस्सा होता है और जो दर्शक हमें देखने आती है वह हीरो होती है।’

आहाना कुमरा   

लिपिस्टिक अंडर मॉय बुर्का और रंगबाज की अभिनेत्री आहाना कुमरा ने विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर अपनी यादों पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘जब मैं 14 वर्ष की थी तब पृथ्वी थियेटर की एक कार्यशाला का हिस्सा बनी थी। इसके बाद ही रंगमंच के प्रति मेरी दिवानगी पैदा हुई। वह कार्यशाला नीरज काबी की देखरेख में हुई थी। जिसके बाद थियेटर मेरी जिंदगी का अटूट हिस्सा बन गया।’ आहाना ने आगे बताया, ‘नसीर सर और रत्ना मैम मेरे मेंटर थे और मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है। बाय जॉर्ज मेरा पहला नाटक है और यह मेरे दिल के बहुत ही करीब है।  फैसल राशिद के साथ भी मैंने काम किया है।  मुझे अब भी एनसीपीए पर हमारा पहला शो याद है। मैं सीधे गई और जाकर नसीर सर को गले लगा लिया और कहा मुझे यह मौका देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।’

जॉय सेन गुप्ता  

जी थियेटर के नाटक शिरीन शान के अभिनेता जॉय सेन गुप्ता कहते हैं कि उनकी थियेटर की शुरुआत काफी रोचक रही। उनके अनुसार, ‘मैं एक बेहद शर्मीला व्यक्ति था जिसने अपना आत्मविश्वास स्टेज पर पाया। हमने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में अपने दूसरे वर्ष के दौरान एंटोन चेखव द्वारा एक नाटक किया। इस नाटक का नाम ड्यूरिंग द थ्री सिस्टर्स था।’ वर्ल्ड थियेटर डे के मौके उन्होंने अपने गुरु हबीब तनवीर और सफदर हाशमी को भी याद किया।

आकर्ष खुराना  

जी थिएटर के टेलीप्ले धूम्रपान के निर्देशक आकर्ष खुराना मुंबई के सिनेमाघरों के फॉयर्स और ग्रीन रूम में बड़े हुए। उनके अनुसार, ‘मेरे पिता थिएटर में सक्रिय रूप से शामिल थे। छह साल की उम्र में, मैंने दो नाटकों में अभिनय किया। पहला, बेंजामिन गिलानी द्वारा निर्देशित वेडिट फॉर गोडोट और सुनील शानबाग द्वारा निर्देशित सर्कस। इन नाटकों के मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।’

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